501 घड़ों से भरवाया जाता है कुंड, शीतल जल से भरा घड़ा व मर्जनी धारण करने वाली देवी
"शादी को 11 साल बीत गए, लेकिन हमें बेटा नहीं हुआ। गांव और परिवार के लोग ताने मारने लगे। तानों ने जीना मुश्किल कर दिया। तभी एक सुबह अचानक माँ शीतला का ध्यान आया। मैंने मनौती मानी कि यदि बेटा हुआ तो माँ, तेरे दरबार आकर कुंड को गंगाजल से भरवाऊँगी।"
फतेहपुर के धाता की विभा सिंह यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने बताया कि बेटे का जन्म माँ की कृपा और मनौती पूरी होने के बाद हुआ। इसके बाद वह सपरिवार माँ शीतला के दरबार, कड़ा धाम पहुँचीं। वहाँ उन्होंने माँ के कुंड को गंगाजल से भरवाया तथा बेटे का मुंडन संस्कार कराकर माता के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की।
दारानगर की रेखता देवी ने बताया कि उनकी बेटी के पति एयर फोर्स से रिटायर्ड हुए थे। इसके बाद उन्होंने दामाद के लिए बैंक में नौकरी की मनौती माँगी। माँ ने उनकी फरियाद सुनी और बेटी के पति को बैंक में कैशियर की नौकरी मिल गई। मनौती पूरी होने पर वह बेटी और दामाद के साथ मंदिर पहुँचीं तथा मेवा मिश्रित दूध से माता रानी का कुंड भरवाया।
माँ शीतला के भक्त मूल प्रकाश तिवारी ने बताया कि उन्होंने चुनाव में विजय प्राप्त करने की मनौती माँगी थी। मनौती पूरी होने पर उन्होंने दूध से जलहरी भरवाई।
51 शक्तिपीठों में शामिल कड़ा धाम में माता सती के दाहिने हाथ का कर (हथेली/पंजा) गिरा था। तभी से गंगा तट पर स्थित इस पावन धाम में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु अपनी दुख-तकलीफ लेकर माता के दरबार आते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु अपनी मनौती के अनुसार माँ को भेंट अर्पित करते हैं।
पुरोहित नंदलाल ने बताया कि माता शीतला कुलदेवी होने के साथ-साथ पूर्वांचल की आराध्य देवी हैं। भक्त मनौती पूरी होने पर माता का कुंड भरवाते हैं। मान्यता है कि माँ का निवास इसी पवित्र कुंड में है।
पुरोहित विनय पंडा ने बताया कि माता शीतला के शीतल स्वरूप की पूजा करने से भक्तों को जीवन के कष्टों और दुखों से राहत मिलती है। माँ प्रत्येक भक्त की झोली खुशियों से भर देती हैं और संतान सुख का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
अब जानिए, कैसा है माँ का स्वरूप
मंदिर के गर्भगृह में माता शीतला मूर्त रूप में विराजमान हैं। उनका स्वरूप एक साधारण नारी के समान है। उनके एक हाथ में मर्जनी (झाड़ू) तथा दूसरे हाथ में शीतल जल से भरा घड़ा है। माता गर्दभ (गधे) पर विराजमान हैं।
मंदिर के गर्भगृह में ही माता सती का पवित्र कुंड स्थापित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहाँ माता सती के दाहिने हाथ का पंजा गिरा था। भक्त माता के दर्शन-पूजन के बाद अपनी मनौती पूर्ण होने पर कुंड को दूध, जल, गंगाजल, फल, मेवा और मिष्ठान से भरवाकर श्रद्धा अर्पित करते हैं।
माता शीतला के भक्त देश-विदेश से आकर उनके दर्शन का लाभ प्राप्त करते हैं। इसके अलावा पूर्वांचल के लोग विशेष रूप से माता शीतला की पूजा-अर्चना करते हैं। शीतला अष्टमी, नवरात्र और आषाढ़ माह के विशेष मेले के दौरान यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
बरसाती लाल पंडा के अनुसार, कुंड भरवाने में लगभग 501 घड़ों का जल समर्पित किया जाता है। यदि कोई भक्त मेवा, मिष्ठान और फलों से कुंड भरवाता है तो लगभग 350 कुंतल सामग्री लगती है। वहीं दूध से कुंड भरवाने के लिए लगभग 350 किलो दूध, 25 किलो चीनी और पाँच प्रकार के मेवे अर्पित किए जाते हैं।
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